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निडाना के अजूबे

गाँव के ऐसे लोग और किस्से जिनके पास अपने मूल कार्यक्षेत्र के अलावा असाधारण शारीरिक क्षमता, अदम्य साहस, विलक्ष्ण वीरता, तीव्र बुद्धि और आत्म शक्ति के संचय की सिद्धि थी या है| गाँव के ऐसे किस्से जो गाँव में आज भी गाये-सुनाये जाते हैं| ऐसे गुण जिनको आज की आधुनिक भाषा में हम "Extra Curricular Skills" के नाम से जानते हैं|
किस्सा - 8: स्वर्गीय चौधरी दादा जागर सिंह मलिक
अतिरिक्त प्रतिभा - तीव्र मनोवैज्ञानिकता, खुले दिल और बड़े जिगर के मालिक
मूल कार्यक्षेत्र - किसान

व्याख्या: वैसे तो आप (दादा जी) गाँव में 1935 से स्थापित सरकारी उच्च विधालय के लिए जितनी चाहिए उतनी जमीन दान करने के कारण आज भी गाँव के सबसे बड़े दानवीर कहलाते हैं| लेकिन इससे ज्यादा आपकी तीव्र मनोवैज्ञानिकता, खुले दिल और बड़े जिगर मिशालें आज भी लोक-किवदंतियां बन गाँव के लोगों की जुबानों पर पाई जा सकती हैं| जिसमें से एक ऐसे ही किस्से का विवरण यहाँ दे रहा हूँ, जिसमें कि आपके हस्यास्द्पूर्ण स्वभाव और खुले दिल की झलक देखने को मिलती है:

पुराने जमानें में ब्याह-शादी में बरातें 3 दिन रुका करती थी और खापलैंड के गावों में ये प्रचलन था कि बारात के ठहरने का पूरा खर्चा और प्रबंध गाँव के लोग मिलकर उठाते और करते थे (आज की तरह नहीं था कि लड़की वाले को सब कुछ अकेले ही करना पड़ता है)| और बारात में आये हुए सबसे बिगडैल, नखरैल और अड़ियल बाराती को आपके (दादा जी) घर ठहराया जाता था क्योंकि आपमें ऐसी विलक्ष्ण मनोवैज्ञानिकता की समझ थी कि ऐसे-ऐसे अड़ियल बाराती भी या तो आपकी आवभगती और मेहमान-नवाजी का लोहा मान जाते थे अन्यथा रातों-रात एडियो-थूक लगा (साथी बारातियों को घर पर काम होने का बहाना बना) फुर्र हो जाया करते थे|

ऐसे ही एक बार क्या हुआ कि गाँव में बांगर (हरियाणा का जींद-उचाना से पंजाब की ओर का क्षेत्र बांगर कहा जाता है) के एक गाँव से बारात आई| और क्योंकि उस जमानें में मोटर-गाड़ियाँ तो होती नहीं थी, जाट-जमींदार दूरस्थ आने-जाने हेतु घोड़े-घोड़ियाँ और बैल-गाड़ियाँ रखा करते थे| तो ऐसे ही उस बारात में एक ऐसा बातूनी और माँ को माँ ना कहने वाला (हरियाणवी में माँ को माँ वो नहीं कहता जो जवानी के मद में रहता हो (वही गधे के अढाई दिन वाली बात) और अपने से किसी को बड़ा ना समझता हो) बाराती आया तो उसनें अजीब सी शर्तें रख दी कि मुझे ऐसे जजमान के घर ठहराओ जिसके यहाँ मेरी घोड़ी तो बुखारी (चने के गोदाम को हरियाणवी में बुखारी कहते हैं) पे खड़ी हो के चरे और जब तक मैं ना, ना कहूँ वो मेरे को खिलाता जाए| तो बस फिर क्या था गाँव वालों ने कहा कि अच्छा"गाखडया" (मतलब बिगड़ा हुआ) जाट है इसको तो दादा जागर के घर छुड्वाओ, और उसको और उसकी घोड़ी दोनों की आवभगती दादा जागर के जिम्मे सोंप दी गई|

दादा जागर ने क्या किया कि उसकी घोड़ी को तो बुखारी पर बंधवा दिया और उसके रात के नास्ते में एक परात (वो बड़ा बर्तन जिसमें रोटियाँ बनाने के लिए आट्टा गूंथा जाता है) में उसके लिए बूरा (मीठा) दाल दिया, एक बड़ी कुलिया (जो कि 1 से 1.5 लिटर पिघला हुआ घी आ जाए, इतनी बड़ी होती थी उस जमाने में) घी की रख ली, और दूसरी परात में ढेर-साड़ी रोटियाँ व् अन्य खाने की सामग्री रखवा दी| और पास में एक गंडास रख लिया| और मेहमान को भोजन करवाने को आगे बढे|

तो दादा नें घी की कुलिया उठाई और मीठे वाली परात में धार लगा दी और बोले कि जब आप बस कहोगे तभी यह धार रोकूँगा| पर वो बाराती भी बड़ा ढीठ था और पूरी कुलिया घी की खाली हो गई पर शेर ने ना नहीं की| फिर दादा ने कहा कि आप भोजन करना शुरू कीजिये| लेकिन दादा का इतना फक्कडपना देख के बाराती समझ तो गया था कि नहले पे दहले से टक्कर हुई है तेरी| खैर उसनें धीरे से खाना शुरू किया| तो उधर दादा नें गंडास को पत्थर पर रगड़ना शुरू कर दिया|

दादा को ऐसा करते देख, बाराती को टेंशन हुई और पूछ बैठा कि आप ऐसा क्यों कर रहे हैं तो दादा ने कहा कि गंडास को पिना (पैना) कर रहा हूँ| तो बाराती फिर पूछ बैठा कि वो किसलिए? तो दादा ने कहा कि अगर तूने ये सारा खाना नहीं खाया और तेरी घोड़ी ने बुखारी को खाली करने से पहले उसमें से गर्दन उठाई तो दोनों को यहीं के यहीं काटूँगा| बाराती तो अब तक का नजारा देख पहले ही पशोपेश में आ चुका था और अब तो उसको पक्का जच गया था कि जो इतना दिल खोल के खिला सकता है वो गर्दन काटने में कितनी देर लगाएगा? और सच भी था वो इससे पहले बहुत सी बरातों में गया था पर ऐसा आवभगती करने वाला कहीं नहीं मिला|

तो थोड़ी देर तो उसनें कोशिश करी पर जब सारा नहीं खा पाया तो बोला कि चौधरी साहब घर पर मेरी माँ बीमार थी सो उसकी चिंता में खाना खाया ही नहीं जा रहा और मुझे तो जाना है अभी के अभी, मेरी माँ को संभालने| शायद उसको जंच गई थी कि अभी तो 3 दिन के ठहराव का पहला ही खाना है और अगर पूरे 3 दिन इसके पास रुकना पड़ा तो बड़ा भारी हो जायेगा, और अगर शादी वालों को यह कहूँगा कि मेरा जजमान बदल दो सब मेरा मजाक उड़ायेंगे कि तब तो बड़ी ढींगे मार रहा था कि ये चाहिये-वो चाहिये| इसीलिए उसनें तो पकड़ी अपनी घोड़ी की लगाम और सीधा जा के अपने गाँव रुका और घर की दहलीज पर पहुँचते ही आवाज लगाई (ठेठ बांगरू में):

बाराती (अपनी माँ से): ऐ री माँ!

और क्योंकि माँ को अपने बेटे के मुंह से माँ शब्द सुने एक अरसा हो गया था तो माँ ने कहा

माँ: रे बेटा, न्यूं क्यूकर मेहर होई रे परमात्मा की, जो तनै मैं माँ कह कें पुकारी?

बेटा (अपने बाराती महाशय): अरी माँ ओ माँ कुहावनिया ऐडड़ दिद्याँ आळआ था| अर्थात (हाथों को खोल के ईशारे से बताते हुए) वो मेरे से माँ कहलवाने वाला इतनी मोटी-मोटी आँखों वाला था

तो फिर उसकी माँ जी ने दादा जी के पास वापिस संदेशा पहुंचवाया और कहलवाया कि दादा थारा कर्म बना रहे-खेड़ा जमा रहे जो मेरे बेटे के मुंह पे वापिस माँ शब्द धरवाया|

तो ऐसे थे हमारे दादा जागर जी, इनकी महानताओं को शब्दों में पिरोती एक कविता भी बनाई गई है, जो आप यहाँ से पढ़ सकते हैं| शीर्षक है: "दादा जागर हो, फेर न्यडाणे आइये"

और इसे कहते थे पुराने जमाने के लोगों की human management की कला, कि आदमी को अपनी जिद्द पूरी करने का मौका भी देते थे पर उसको हंसी-हंसी में लाइन पे भी लगा देते थे|

किस्सा - 7: स्वर्गीय चौधरी दादा प्रहलाद सिंह मलिक
अतिरिक्त प्रतिभा - अदम्य साहस, विलक्ष्ण वीरता, तीव्र बुद्धि
मूल कार्यक्षेत्र - किसान


व्याख्या: आपने अकेले अपने अदम्य साहस और तीव्र बुद्धि के बूते 100 घोड़ों से सजी, गाँव पर चढ़ती आ रही धाड़ (लुटेरों की सेना) को वापिस मौड़ दिया था| आपके ऊपर एक कविता भी बनाई गई है जो वेबसाइट के शोर्य-गाथाएं पृष्ठ से पढ़ी जा सकती है, कविता का शीर्षक है "दादा प्रहलाद हो, न्यडाणा ताह्मनै शीश नुवावे हो!" यह कविता पढ़कर आपको अहसास होगा कि ऐसे वीर विरले ही होते हैं जो सदियों में एक बार जन्म लेते हैं|

आप से ही गाँव में दो कहावतें मशहूर हुई: एक "के तनै धाड़ मारै सै/के तरे पै धाड़ पड़गी" और दूसरी फलाणी धकड़ी बात "देख्या ए ना इसा धाड़ मोड़निया"|

किस्सा - 6: स्वर्गीय दादा पंडित देशराज (उर्फ़ देशा)
अतिरिक्त प्रतिभा - विलक्ष्ण शारीरिक ताकत
मूल कार्यक्षेत्र - किसान

व्याख्या: अपने वक्त के गाँव के सबसे ताकतवर शख्सियतों में आपकी गिनती होती थी| आप पेशे से किसान होते हुए भी इतने ताकतवर थे कि आप एक बार शामली, उत्तर प्रदेश से कुछ सामान लेने गए| वहाँ इत्तेफाक से आपका मुकाबला उस जमाने के उत्तर प्रदेश मशहूर पहलवान अब्दुल से हुआ और आपने उनको पटखनी दे डाली| इस ख़ुशी में आपको वहाँ एक महीने तक मेहमान की तौर पर ठहराया गया| आते वक्त एक बैलों की जोड़ी और घड़ी भेंट स्वरूप आपको दी गई|

आपकी ताकत का दूसरा उदाहरण इस बात से मिलता है कि आप एक डबड़े जितने क्षेत्र की बाजरे की पूळी एक गाँठ में बाँध अकेले उठा लिया करते थे|

गरीब पारिवारिक परिवेश होने की वजह से आपको कभी-कभी भरपेट खाना नहीं मिल पाता था| ऐसे ही एक बार की बात है कि ग्यास के दिन पड़ाना गाँव में कब्बड्डी प्रतियोगिता का आयोजन था, तो पड़ाना गाँव का एक आदमी निडाना में आ पूरे गाँव की छुट्टी (खुला चेलेंज) बोल गया| यही बात गाँव के एक बनिए को पता लगी, उन्होंने आपको बताई तो आपने कहा कि लाला जी, 2-3 दिन से कुछ नहीं खाया है| तो लाला जी ने आपको लस्सी-गुड़ और खाने की सामग्री दी जो खाकर आप पड़ाना गए और पड़ाना की पूरी कब्बड्डी टीम को अकेले ही चित कर आये थे|

किस्सा - 5: स्वर्गीय दादा पंडित हरिराम
अतिरिक्त प्रतिभा - विलक्ष्ण शारीरिक ताकत
मूल कार्यक्षेत्र - किसान

व्याख्या:स्थानीय किद्वंती के अनुसार दादा जी में इतनी शारीरक ताकत बताई गई कि आप आधी-रात गए निडानी गाँव की चौपाल के थांब (पत्थर खम्ब) जो कि तकरीबन 200 किलो वजनी था, को वहाँ से उठा निडाना ले आये थे| निडाना और निडानी के बीच की दूरी लगभग 3 किलोमीटर है| सो आज के जमाने के अनुसार तो 200 किलो वजन उठा के वो भी 3 किलोमीटर चलना असम्भव सा ही लगता है|

किस्सा - 4: चौधरी सूबे सिंह पुत्र स्वर्गीय चौधरी माइया सिंह मलिक
अतिरिक्त प्रतिभा - विलक्ष्ण शारीरिक ताकत
मूल कार्यक्षेत्र - किसान

व्याख्या: आपके जवानी के दिनों में इतनी शारीरिक ताकत बताई गई कि आपने खेतों को समतल करने वाले रोलर (स्थानीय भाषा में गिर्डी) जो कि लगभग 250 किलो वजनी थी को खेल-खेल में कंधे पर उठा लिया था| आप आज भी जीवित हैं और आपको आज के दिन देखकर शायद ही कोई आपके उस जमाने के शारीरिक बल का अंदाजा लगा पाए| कहते हैं कि वह गिर्डी आज भी आपके खेतों में जीर्ण-क्षीर्ण अवस्था में पड़ी हुई है, जिसको उठाना आपके लिए बच्चों के खेल जैसा था|

किस्सा - 3: स्वर्गीय चौधरी भरत सिंह पुत्र स्वर्गीय चौधरी बादाम सिंह मलिक
अतिरिक्त प्रतिभा - विलक्ष्ण शारीरिक ताकत
मूल कार्यक्षेत्र - फौजी


व्याख्या: आपमें खाने की और उसको पचाने की एक विलक्ष्ण ताकत थी| आप 90 से 100 देशी घी से बने लड्डू एक बैठ में खा जाते थे| ऐसे ही एक कस्सी को पूरी हलवे से भरी कढाई में डाल के भरी बाहर निकालो तो उसमें तक़रीबन 5 किलो हलवा आता था, जिसको आम भाषा में एक गाची हलवा बोलते हैं को एक बैठ में खा जाते थे| आपकी इस विलक्ष्ण प्रतिभा ने कई सभाओं और महफ़िलों में खूब चर्चाएँ बटोरी जो आज तक भी गाँव की बैठकों में खाने की क्षमता पे चर्चा में सुनी जा सकती हैं|

किस्सा - 2: स्वर्गीय चौधरी जोरावर सिंह (उर्फ़ जोरा) पुत्र स्वर्गीय दादा अमीचंद मलिक
अतिरिक्त प्रतिभा - विलक्ष्ण शारीरिक ताकत
मूल कार्यक्षेत्र - किसान

व्याख्या: मन की नियत से साफ़ और बेबाक होने और एक सफल कृषक होने के साथ-साथ, आप गाँव के उन लोगों में गिने जाते हैं जो एक जगह बैठे-बैठे 1 किलो देशी घी पानी की तरह पी कर हजम कर जाते थे|

किस्सा - 1: चौधरी सूरत सिंह पुत्र स्वर्गीय दादा कुन्दन मलिक
अतिरिक्त प्रतिभा - विलक्ष्ण शारीरिक ताकत
मूल कार्यक्षेत्र - किसान

व्याख्या: आप एक वक्त में 3 किलो देशी घी के लड्डू या कई मिठाइयों का मिश्रण खा जाते थे| कहा जाता है कि आपको खाना थाली की जगह डोंगों और परातों में परोसा जाता था| आपके खाने की क्षमता पर कई बार हास्यास्पद किस्से भी बने|


निवेदन: हम निडाना से सम्बन्ध रखने वाले हर जाति-धर्म-लिंग-समुदाय के शख्स (महिला-पुरुष दोनों) से निवेदन करते हैं कि अगर आप भी अपने गाँव के किसी भी ऐसी ही विलक्षण प्रतिभा के पुरुष-स्त्री के बारे में जानते हैं तो हमें जरूर बताएं| अपने गाँव के हर ऐसी सख्शियत की कहानी प्रदर्शित करने से ही हमारा निडाना हाइट्स बनाने का उद्देश्य सार्थक होगा| आप हमें इस पते पर मेल कर सकते हैं: nidanaheights@gmail.com आप चाहें तो उस इंसान की फोटो, विडियो भी हमें भेज सकते हैं|



जय दादा नगर खेड़ा बड़ा बीर

लेखक: पी. के. मलिक

दिनांक: 20/11/12

हवाले से:
  • संदीप मलिक
  • फूल कुमार मलिक
  • अमित मलिक, निडाना
  • प्रदीप मलिक, निडाना
  • NH सलाहकार मंडल

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